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The Statement of Dhadak 2 Director Shashank Iqbal: “Jati is everywhere, not just in rural India”

Shazia Iqbal directing Dhadak 2, highlighting caste issues in modern urban India

Introduction

Bollywood movie Dhadak 2 director Shashank Iqbal has recently made a statement that has sparked fresh conversations around the social structure of the country. Shashank emphasized that the caste system is not limited to rural India, but is deeply prevalent in urban India as well—though it manifests differently.

His statement not only reflects the core theme of Dhadak 2 but also clearly underlines the fact that casteism remains entrenched in Indian society, across every sector and social class.


Truth Behind the Urban Bluff

In an interview, Shashank stated:

“Jati is everywhere — in schools, in offices, in housing societies, and even in the film industry. We cannot say that we have got rid of it just because we live in cities.”

It is commonly believed in India that with urbanization, social evils like caste-based discrimination are fading away. However, the reality, as Shashank points out, is quite the opposite.

Even though urban casteism may seem more polite or disguised, it is just as deep-rooted and dangerous as in rural areas.


Dhadak 2 – An Empathetic Social Perspective

While Dhadak (2018) was criticized for merely touching on caste-related issues superficially, Dhadak 2 is taking a more sincere and unfiltered approach to presenting these realities.

सिद्धांत चतुर्वेदी और त्रिप्ती डिमरी फिल्म की मुख्य भूमिकाएं निभा रहे हैं।
शाजिया ने कहा कि यह फिल्म सिर्फ एक प्रेम कहानी नहीं है, बल्कि यह दिखाती है कि जब दो लोग अलग-अलग जातियों से होते हैं, तो समाज उन्हें जीने का भी हक नहीं देता

“लोग कहते हैं, ‘अच्छे परिवार से है’ या ‘हमारे टाइप की नहीं है’ — ये सभी कोडवर्ड्स हैं।”
“शहरों में यह बात ढकी-छुपी होती है, लेकिन असली मंशा वही पुरानी होती है।”


शाजिया इकबाल: एक संवेदनशील फिल्मकार

शाजिया इकबाल पहले पत्रकार थीं और फिर एक जागरूक फिल्म निर्माता के रूप में उभरीं।
उनकी पहली शॉर्ट फिल्म बेबाक ने पितृसत्तात्मक सोच पर सीधा प्रहार किया था। अब वह धड़क 2 के माध्यम से गंभीर जातिगत असमानता जैसे विषय को मुख्यधारा के सिनेमा में ला रही हैं।

उन्होंने कहा:

“सिनेमा का काम है — नीरस को उत्तेजित करना और आरामतलब को बेचैन करना
हमें सिर्फ सपनों की दुनिया नहीं दिखानी चाहिए, बल्कि समाज की सच्चाई को उजागर करना चाहिए।”


फिल्म इंडस्ट्री और जातिगत मुद्दे

भारतीय फिल्म उद्योग अक्सर जातिवाद जैसे मुद्दों को अनदेखा करता आया है, क्योंकि ये व्यावसायिक रूप से सुरक्षित नहीं माने जाते। लेकिन कुछ फिल्मकार जैसे:

  • नागराज मंजुले (Sairat)
  • नीरज घेवन (Masaan)

ने जातिगत यथार्थ को प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत किया है
अब शाजिया इकबाल भी उन्हीं दृढ़ और जिम्मेदार फिल्मकारों की पंक्ति में आ खड़ी हुई हैं, जो मानते हैं कि सिनेमा का काम सिर्फ मनोरंजन नहीं, बदलाव लाना भी है।


नए भारत की सोच और बदलाव

लेकिन धड़क 2 सिर्फ एक फिल्म नहीं है। यह आज के नए भारत की सोच को दर्शाती है।
आज का युवा वर्ग, जो सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों से जुड़ा है, जातिवाद, लिंगभेद, और वर्गभेद जैसे मुद्दों को पहले से कहीं अधिक समझने और चुनौती देने में सक्षम है।

“मेरे रिसर्च के दौरान, कई युवाओं ने बताया कि उन्हें सरनेम, गांव या भाषा के आधार पर जज किया गया,” शाजिया ने कहा।
“शहरों में भले ही यह दिखे नहीं, पर इसका असर बहुत गहरा होता है।”


प्रतिनिधित्व और वास्तविकता का जुड़ाव

“स्क्रीन पर प्रतिनिधित्व से अधिक जरूरी है परदे के पीछे की भागीदारी
कहानियाँ उन्हें सुनानी चाहिए जिन्होंने इन्हें जिया है, ना कि सिर्फ कल्पना की है।”

धड़क 2 के माध्यम से शाजिया दर्शाना चाहती हैं कि समाज किसे प्रेम करने का अधिकार देता है और किसे नहीं
वह दर्शकों को असुविधाजनक मगर ज़रूरी प्रश्नों से टकराने पर मजबूर करना चाहती हैं।


आगे की राह और आशा

जैसे-जैसे धड़क 2 अपनी रिलीज़ की ओर बढ़ रही है, यह सिर्फ एक फिल्म न रहकर सामाजिक रूप से प्रासंगिक आंदोलन का रूप लेती जा रही है।

सिद्धांत और त्रिप्ती की जोड़ी, और शाजिया का साहसिक दृष्टिकोण, इसे एक दमदार फिल्म बनाने की ओर बढ़ा रहा है।

“अगर एक भी दर्शक थिएटर से बाहर निकलकर ये सोचे कि
‘क्या मैं भी किसी को उसकी जाति, भाषा या क्षेत्र के कारण जज करता हूं’,
तो हमारा उद्देश्य पूरा हुआ।”


निष्कर्ष: बदलाव की ओर एक कदम

धड़क 2 जैसी फिल्में हमें यह याद दिलाती हैं कि जातिवाद केवल ग्रामीण भारत की समस्या नहीं है, बल्कि यह हर शहर, हर वर्ग, हर दायरे में मौजूद है

शाजिया इकबाल की साफगोई और ईमानदार फिल्म निर्माण यह साबित करता है कि:

“सच्चा बदलाव तब शुरू होता है जब हम मुंह मोड़ना बंद कर देते हैं।”


📝 लेखक का दृष्टिकोण:
यह लेख धड़क 2 की सामाजिक चेतना और निर्देशक शाजिया इकबाल की स्पष्ट दृष्टि को रेखांकित करता है। यह केवल एक फिल्म की समीक्षा नहीं, बल्कि भारतीय समाज में छिपे असमानता के यथार्थ की पड़ताल है।

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